December 11, 2017 6:50 pm

आज भी कौतूहल का विषय बनी है ग्यू की ममी

हिमाचल न्यूज़ संवाददाता, काजा. प्रदेश की स्पीति घाटी जहां बौद्ध मठों व रेत की दृश्यावलियों के कारण विश्व विख्यात है, वहीं यहां ऐसा बहुत कुछ है, जो हैरान करने वाला है. यहीं के एक गांव में जिस तरह से एक लामा की ममी का अस्थि पिंजर बैठी हुई मुद्रा में अभी तक भी सलामत है, अभी भी उसके सिर पर बाल हैं, उसी मुद्रा में Gyu Mummyअब एक मंदिर के भीतर स्थापित है, यह सब देखते ही बनता है.चीन के अधिकार वाले तिब्बत की सीमा से कुछ ही दूरी पर स्पीति का समदो की ओर से पहला गांव है गियू, जो समदो काजा सड़क से कुछ हटकर एक संपर्क सड़क से जुड़ा हुआ है. बताया जाता है कि 1987 में इस गांव के लिए जब सड़क का निर्माण हो रहा था, तो सेना की सड़क निर्माण कंपनी के मजदूरों को खुदाई के दौरान गांव से कुछ दूरी पर एक सुरक्षित व ताजा दिखने वाला अस्थिपिंजर नजर आया. इसे देखते हुए यहां खुदाई बड़ी सावधानी से की गई और समूचे अस्थिपिंजर को ज्यूं का त्यूं ही निकाला गया. इस अस्थिपिंजर को लगभग सौ साल पुराना माना गया, यह एक लामा की ममी है, जिस पर बाल ज्यूं के त्यूं कायम थे तथा हाथ-पैरों के नाखून बढ़े हुए थे, मांस हड्डियों से चिपका हुआ और समाधि स्टाइल में यह अस्थिपिंजर था. गांव वाले बताते हैं कि यह उनके गांव का लामा नहीं था, बल्कि जिस तरह से यह कंदरा में समाधिरत पाया गया, उससे माना जाता है कि यह कोई जाना माना लामा था, जो यहीं पर तपस्यारत रहा और यहीं समाधि भी ले ली. लोगों की मदद से सेना के जवानों ने इसे उठाकर गांव में ले जाकर वहां पर छोटा सा मंदिर बना कर उसमें इसे रख दिया. इस अस्थिपिंजर को देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी आते हैं. गांव के लोगों ने इसकी विधिवत रूप से पूजा-अर्चना आरंभ कर दी है. एक विस्मयकारी हालत व मुद्रा में मिला एक लामा की ममी का यह अस्थिपिंजर अब पर्यटकों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है और इस कारण यह गांव भी विश्व विख्यात हो गया है. किन्नौर की ओर से आने पर समदो से कुछ दूरी पर एक अलग सड़क गियू के लिए मुड़ती है. छोटा सा गांव ठंडे रेगिस्तान स्पीति के दूसरे गांवों की तरह है, मगर यहां जो सबसे अलग है वह अभी भी सुरक्षित हालत में एक लामा की ममी का अस्थिपिंजर, जिसे देखना कोई नहीं भूलता. किसी जाने माने सिद्ध लामा का अस्थिपिंजर होने के कारण यह गांव भी बौद्ध धर्म के अनुयायियों के एक तीर्थ जैसा बन गया है. स्पीति में चूंकि वातावरण ठंडा ही रहता है ऐसे में यह माना जाता है कि कोई तपस्वी लामा एक निर्जन, कोलाहल से दूर, सुविधाविहिन कंदरा में तपस्या करते-करते यहीं पर समाधि लगा गया.

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