October 24, 2017 9:44 am

एक बैल से खेती की जाती है पांगी के मिंधल गांव में

hqdefaultहिमाचल प्रदेश के चंबा जिला के पांगी मुख्यालय किलाड़ से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मिंधल गांव. यह गांव वास्तव में ऐतिहासिक व प्रकृति द्वारा संजोया गया अनोखा गांव है. इस गांव से होकर चैनी जोत को रास्ता जाता है, जिसकी ऊंचाई 14,569 फुट के आसपास है. यह जोत साच पास के जोत से भी ऊंचा है. चैनी जोत के द्वारा ऐतिहासिक चुराह मंदिर  देवी कोठी से होकर चंबा पहुंचा जा सकता है. मिंधल गांव की आबादी लगभग 375 है. यहां के लोग मेहनतकश हैं तथा ईमानदार हैं. यह गांव चंद्रभागा के ऊपर स्थित है.

      गांव में मिंधल माता का मंदिर भी है. जिसके कारण गांव का नाम मिंधल पड़ा. इसे पहले माँ ईंधन कहा जाता था और अब बिगड़ता बिगड़ता मिंधल बन गया है. इस बात की पुष्टि इस दन्तकथा से होती है जो इस गांव के लोगों की ही नहीं, पूरी पांगी घाटी के लोगों की जुबान पर है. मंदिर के पुजारी के अनुसार एक बूढ़ी घुंघरी चूल्हे से दिन में तीन बार धूड़-धूल-निकालती थी. एक बार जब बूढ़ी धूड़ निकाल रही थी, तो चूल्हे में से पत्थर ऊपर आ गया. उसने पत्थर को दबा दिया. यह क्रम लगातार तीन दिनों तक चलता रहा. तीसरे दिन पत्थर चूल्हे को फाड़कर ऊपर आ गया. बूढ़ी डर गई. उसी समय एक देवी प्रकट हुई. देवी ने कहा इसी समय अपने पुत्रों और पुत्रवधुओं को बुलाओ. अगर एक ही आवाज़ में वे आ गए तो ठीक है, नहीं तो अंजाम ठीक नहीं होगा. बुढिय़ा थर्र थर्र कांपने लगी और प्रार्थना करने लगी कि मुझे माफ कर दो. तब देवी ने कहा कि मुझसे पहले तेरी पूजा होगी. इस पर जब बुढिय़ा अपने पुत्रवधुओं और पुत्रों को बुलाने गई तो उन्होंने बुढिय़ा की बात अनसुनी कर दी तथा उसपर विश्वास नहीं किया. तभी वे पत्थर बन गए जिनके अभी तक चिन्ह विद्यमान हैं. बुढिय़ा जब वापस गई तो वह भी पत्थर बन गई. पुजारी ने बताया कि इस मंदिर की चोटी पर कौवा नहीं बैठता. यहां आज भी  एक बैल से खेती की जाती है. इस गांव के लोग पहले चारपाई पर नहीं सोते थे. यदि वे ऐसा करते थे तो उन्हें नुक्सान झेलना पड़ता था. जैसे जैसे विकास होता गया, यह प्रथा भी घटती गई. मंदिर के इतिहास के बारे में प्राचीन पांडुलिपि अभी भी मौजूद हैं. यहां मुख्य रूप से आलू, जौ, कनक, राजमाह, मक्की, भंगड़ी, फूलण की फसलें उगार्द जाती हैं. जौ की पात्तर-शराब भी यहाँ बनाई जाती है, जो स्वास्थ्यवर्धक मानी जाती है. यहां विवाह पीठचुक -अपहरण पद्धति द्वारा होता है. यहां भाद्रपद तथा आश्विन मास की पुर्णिमा के दिन मेला लगता है, जिसमें पांगी के सभी लोग उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं.

drinking-water-problemयहां की महिलाएं दुपट्टे के स्थान पर जोजी लगाती हैं, जो दूर से सितारों की तरह चमकती है. गले में मोतियों की माला व बदन पर गर्म चादर और लंबी कमीज़ व चूड़ीदार पायजामी या सलवार इनकी प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है. पुरूष सफेद टोपी तथा ऊनी कोट व पायजामा पहनते हैं. पैरों में घास के पुले भी पहनते हैं. वर्तमान पीढ़ी यह पहरावा अपनाती तो ज़रूर है लेकिन इसमें हिचक सी महसूस करती है. मिंधल में जीप योग्य सड़क बन रही है. लोग चाहते हैं कि यह सड़क शीघ्र बनकर तैयार हो. चंद्रभागा को पार करने के लिए लोक निर्मााण विभाग द्वारा पुल भी डाला गया है. यहां पर माध्यमिक पाठशाला, प्रााथमिक पाठशाला व डिस्पेंसरी हैं. गांव में साच से जेनरेटर द्वारा विद्युत आपूर्ति की जाती है. लोगों की मांग है कि चरी में हिम ऊर्जा का प्लांट स्थापित करके यहां नियमित विद्युत आपूर्ति की जाए. यहां के बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए साच व चंबा जाना पड़ता है. पुजारी के अनुसार मंदिर का सरकारीकरण तो कर दिया गया है लेकिन इसका समुचित विकास नहीं किया जा रहा है. यहां घुरई का नृत्य किया जाता है, जो प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है.

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