December 11, 2017 6:37 pm

कांगड़ा की सियासत पर मुख्यमंत्री खेल सकते हैं बड़ा दांव

शिमला, विमल शर्मा।
हिमाचल कांग्रेस का राजनीतिक पारा पूरे उफान पर हैं। यह दिलचस्प बना हुआ है कि विधानसभा चुनाव में यह क्या रंग दिखाता है। सुना तो Virbhadra-Singhयहां तक जा रहा है कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह विधान सभा चुनाव से ठीक पहले ऐसा सरप्राइज देने वाले है जिससे कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदारो के पैरो तले तो जमीन जरुर खिसक जाएगी और इसके साथ-साथ कांग्रेस आलाकमान को प्रदेश में सता वापसी का तोहफा भी मिल सकता हैं। यह बात इस लिए भी कही जा रही है कि वीरभद्र सिंह के इस सरप्राइज से कांगड़ा की राजनीति में एक बड़े भूचाल की आहट सुनाई दे रही हैं। इतना ही नहीं कई नेताओं की राजनीति संकट में पड़ सकती हैं। राजनीतिक सूत्र तो यहां तक खुलासा कर रहे है कि हिमाचल राजनीति के केन्द्र कांगड़ा को पहली बार कांग्रेस सरकार का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिल सकता है। राजा की रणनीति का ऐसा चक्रव्यू रचाएगी कि प्रदेश की जनता विशेषकर कांगड़ा के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा। अब हम आप को बताते है कि जिला कांगड़ा का वो कौन सा नेता है जिसको राजा साहब अपना चेहरा बनाना चाहते है। वैसे तो वीरभद्र सिंह इस युवा चेहरे को आगे लाने की विसात तो पिछले चार सालों में बिछा चुके हैं। अब समय आ गया है जब इस चेहरे को सामने लाया जाएगा।
यह चेहरा कांगड़ा का वो युवा तुर्क नेता व कांग्रेस सरकार में मंत्री के पद में आसीन है और इनको वीरभद्र सिंह का दत्तक पुत्र भी माना जाता है। इतना ही नहीं इनके पिता भी वीरभद्र सिंह के हनुमान कहे जाते थे। आप समझ ही गए होगे की यह वो युवा चेहरा जो जिला कांगड़ा में एक स्थापित नेता बन कर उभरे है। मुख्यमंत्री कांगड़ा के इस युवा नेता पर दांव लगाना चहाते है। वीरभद्र सिंह के इस एक तीर से कई निशाने लगने वाले हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जानते है कि जनता का साथ उनके साथ है और यह फैसला प्रदेश हित में भी है। इसके साथ-साथ प्रदेश में क्षेत्रवाद की राजनीति पर भी विराम लगेगा। इतना ही नहीं वीरभद्र के इस निशाने से इनके पुत्र विक्रमादित्य की नईया भी पार लग जाएगी। बहराल यह तो राजनीतिक जानकारों का मानना है लेकिन इतना जरुर है कि वीरभद्र सिंह जैसे मंझे हुए राजनीतिक खिलाड़ी की आखिरी लड़ाई कई रंग दिखाएगी। उधर, बीते दिनों परिवहन मंत्री जीएस बाली तो खुलकर सामने ही आ गए हैं और वीरभद्र सिंह को सरेआम ललकार रहे हैं। कह रहे है कि मंत्री पद से निकालना चाहते हो तो निकाल दो। इतना ही नहीं वीरभद्र सिंह कैबिनेट के आला मंत्री कौल सिंह का एक सरकारी कार्यक्रम में भाजपा नेताओं के सामने मुख्यमंत्री को मैरुन टोपी देने का मामला भी राजनीति से जोड़ कर देखा जा रहा हैं। कुल मिला कर वीरभद्र सिंह के खिलाफ पार्टी में तो दवाब की राजनीति तो चल ही रही है वही पर भाजपा के तीखे आरोपों को झेल रहें मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अब आर-पार की लड़ाई के लिए मूड़ में आ गए हैं। फिलहाल, जो भी है प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनाव को लेकर आरोप प्रत्यारोप की राजनीति तो हर राजनीतिक पार्टी में होती है लेकिन हिमाचल प्रदेश में इस बार मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के लिए परिस्थतियंा पहले की तरह आसान नहीं है। एक तरफ पार्टी में अपने सहयोगियों का भारी विरोध उस पर कांग्रेस आलाकमान अलग से दबाव बनाए हुए है। इतना ही नहीं अपने पुत्र को राजनीति में स्थापित करने के लिए वीरभद्र सिंह को इस समय कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। कांग्रेस आलाकमान युवा नेताओं को आधार बना कर विधान सभा चुनाव में उतरना चाहती है। जिसके चक्कर में पार्टी हाईकमान वीरभद्र सिंह जैसे प्रभावशाली नेता पर भी दबाव बना रही हैं। इसी रणनीति को आधार बनाकर वीरभद्र सिंह भी कांग्रेस आलाकमान के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस संगठन को भी करारा जबाव देने की तैयारी में है। जिसके चलते न बजेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।

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