November 20, 2017 9:08 am

जगती पट्ट में सजी बड़ा छमाहूं की अदालत

सराज घाटी के अधिष्ठाता देवता देवश्री बड़ा छमाहूं मंगलवार को अपनी परिक्रमा के दौरान लाव-लश्कर के साथ ऐतिहासिक नग्गर स्थित जगती पट्ट पर पहुंचे यहां पर देवश्री बड़ा छमाहूं की देव अदालत जगती का आयोजन हुआ। नग्गर स्थित जगती पट्ट में जगती के कारदार Jagatiमहेश्वर सिंह व माता त्रिपुरा सुंदरी के कारदार व संैकड़ों हारियानों ने देवता का भव्य स्वागत किया। यहां पर परम्परा व देव संस्कृति के साथ जगती का आयोजन हुआ और देवता ने कई भविष्यवाणियां भी की। देवता ने कहा कि वह तीनों लोकों के स्वामी हैं और इस तरह का दौरा वह तभी करते हैं जब विश्व पर कोई विपदा आने वाली हो। यहां पर ढ़ोल नगाड़ों के साथ जगती का भव्य आयोजन हुआ और देवता ने विश्व शांति के लिए इसका आयोजन किया। सराज घाटी के अधिष्ठाता देव एवं सृष्टि के रचनाकार देवश्री बड़ा छमाहूं लाव-लश्कर के साथ इस यात्रा पर हैं और हजारों लोग देवता की इस रथ यात्रा में भाग ले रहे हैं। देवता के कारदार मोहन सिंह ने बताया कि इस दौरान देवता कई धार्मिक स्थलों पर गए हैं और नग्गर में जगती के लिए बारह बर्षों बाद देवता यहां आए हैं। मंगलवार शाम को देवता सेउबाग में धर्मवीर धामी के घर पहुंचे हैं। इससे पहले देवता भृगुतुंग की उस पहाड़ी की भी परिक्रमा कर चुके हैं जहां से अठारह करडू देवी देवताओं ने मधुमक्खी का रूप धारण करके जगती पट्ट की शीला को उठा करके लाया था और नग्गर में स्थापित किया था। सनद रहे कि देवभूमि कुल्लू के अठारह करोड़ यानिकि अठारह करडू देवी-देवताओं ने इसी पहाड़ी को तोड़कर जगतीपट्ट मधुमक्खियों का रूप धारण करके उठाकर लाया था और कुल्लू देश की राजधानी नग्गर में स्थापित किया था। इस जग्तीपट्ट को संसार की सबसे बड़ी एवं शक्तिशाली देव शिला माना जाता है। जहां सदियों से विश्व की सबसे बड़ी देव अदालत लगती है। विश्व में कोई भी विपदा आने वाली हो तो अठारह करोड़ देवी-देवता इस शिला पर विराजमान होकर देव कचहरी का आयोजन करते हैं और आने वाली विपदा को रोकने का कार्यभार सभी देवी-देवता को सौंपते हैं। यूं मानो कि इस पहाड़ी से देवी-देवताओं ने काटकर यह शिला लाई थी और नग्गर में  स्थापित की थी। आज देवश्री बड़ा छमाहूं की यह यात्रा व विश्व की भलाई के लिए मानी जा रही है। देवश्री बड़ा छमाहूं विष्णु भगवान का वह रूप है जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदी, शक्ति, शेष भी विराजमान है। देवश्री बड़ा छमाहूं ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदी, शक्ति, शेष छ: देवी-देवताओं के समूह का अवतार माना जाता है। छमाहूं की उत्पति ओम से हुई है और छमाहूं सृष्टि के रचियता हैं । इन छ: शक्तियों के बिना सृष्टि की रचना संभव नहीं है। छमाहूं का अवतार प्रलय के बाद उस समय हुआ था जब सृष्टि की पुन: रचना की जा रही थी। सुर्य, चंद्रमा, पृथ्वी सहित तमाम ग्रह अंधकार सागर में डूबे हुए थे और जब सृष्टि ने फिर से जन्म लेना था तो चारों ओर एक ही ध्वनि थी वह थी ओम की । बह़मा, विष्णु एमहेश जब सृष्टि की रचना करने में जुट गए थे तो सृष्टि पूर्णमय नहीं हो रही थी तब सृष्टि को पूर्ण करने के लिए शक्ति व आदि अनंत को प्रकट करना पड़ा उसके बाद अंधकार सागर से सभी ग्रहों को अपने-अपने स्थानों पर स्थापित किया गया लेकिन उस अंधकार सागर में उन सभी ग्रहों के डूब जाने से इतनी ऊर्जा उत्पन्न हो चुकी थी कि वह ऊर्जा इतनी भयंकर थी कि फिर से प्रलय होने लगी और वह ऊर्जा एकत्र होकर शेषनाग का रूप धारण करके ब्रह्मांड में तबाही मचाने को निकल पड़ी लेकिन पांचों देवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदी, शक्ति ने स्थिति को भांपते हुए पूछा कि तुम कौन से देव हो तो जबाब आया कि सभी ग्रहों की स्थापना तो हो चुकी है लेकिन जो इन ग्रहों से सागर में ऊर्जा उत्पन्न हुई है उसका शेष भाग मैं हूं। उसके बाद उक्त पांचों देवों ने माना कि सृष्टि की रचना में छठी शक्ति भी है और उस शक्ति को शेषनाग का नाम देकर अपने सृष्टि रचना के समूह में शामिल किया। उसके बाद सृष्टि के रचनाकार छ: देवताओं की सामुहिक शक्ति जो अवतारित हुई का नाम छमाहूं पड़ा। छमाहूं का अर्थ है छ: जमा समूह यानिकि छ: देव शक्तियों का एक मुंह। बहरहाल आज तक सृष्टि की रचना के बाद देवश्री बड़ा छमाहूं की पुजा होती है और इस छमाहूं देव को ही सृष्टि का रचनाकार माना जाता है। यह सारी शक्तियां भगवान विष्णु में समाहित है इसलिए यह माना जाता है छमाहूं विष्णु का वह रूप है जिसमे छ: देव समाहित है।

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