June 29, 2017 7:39 pm

ढाई हजार साल पुरानी इस जगह में पहली बार जला बल्ब, रोशनी देख रोने लगे लोग

11-5चंडीगढ़ के पारस लूंबा के प्रयास द्वारा लगाए गए सोलर माइक्रो-ग्रिड्स से लेह-लद्दाख स्थित जंस्कार वैली में 2550 साल पुरानी ‘फुकतल गॉन्पा मॉनेस्ट्री’ रोशन हुई। यह मॉनेस्ट्री जब पहली बार रोशन हुई, तो खुशी के मारे लोगों के आंसू नहीं थम रहे थे। पहली बार एलईडी बल्ब देखकर कुछ लोग रोने लगे तो कुछ पूजा करने लगे। वहीं, कुछ ने पूछा कि इसमें तेल कहां से आ रहा है।

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चमत्कार से कम नहीं था लाइट…

– इतना ही नहीं कुछ के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। वह रोशनी के हर पल का एहसास लेना चाहते थे। शायद इसलिए जब मॉनेस्ट्री रोशनी से जगमगा उठी तो पहले दिन लोग लाइट जगाकर सोए, क्याेंकि वह इस बात से डरे रहे थे कि क्या पता लाइट बंद कर दी तो दोबारा जले-न-जले।
– ऐसा हो भी क्यों न। उनके लिए यह मौका हजारों साल के बाद जो आया था। अब तक जो लोग रात को दीये जगाकर रखते थे, आज वह एक स्विच से लाइट को ऑन-ऑफ करते हैं।
– कुछ दिन पहले ही ग्लोबल हिमालयन एक्सपीडिशन(जीएचई)ने यहां सोलर माइक्रो-ग्रिड्स लगाए हैं।
– एलईडी लाइट्स लगने के बाद वहां लोगों ने जमकर सेलिब्रेशन की। जीएचई की स्थापना अक्षय ऊर्जा और सतत ग्रामीण विकास(सस्टेनेबल रूरल डेवलपमेंट) के मकसद से की गई थी।

साइकलिंग और ट्रेकिंग कर यहां तक पहुंचे11-1

– पारस लूंबा ग्लोबल हिमालयन एक्सपीडिशन (जीएचई) के संस्थापक हैं। उन्होंने बताया कि इस मॉनेस्ट्री को रोशन करने का एक्सपीडिशन 12 दिन का था। पर बर्फ से सड़के ब्लॉक होने के कारण मॉनेस्ट्री तक पहुंचने के लिए उन्हें सात दिन लगे। गाड़ी के अलावा साइकलिंग से और ट्रेकिंग कर यहां तक पहुंचे। जब हम 6वें दिन गांव छाऊ पहुंचे तो लोगों ने हमारा स्वागत किया।पारस ने बताया कि मॉनेस्ट्री पहुंचकर उन्होंने आधे दिन तो मॉनेस्ट्री का मुआयना किया। इस मॉनेस्ट्री में 170 कमरे हैं, यहां हमने डेढ़ दिन में आठ माइक्रो-ग्रिड लगाए।

40 और गांवों को करेंगे रोशन

11-9पिछले करीब ढाई साल में जीएचई लद्दाख क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 11 गांवों को सोलर ऊर्जा के माध्यम से रोशन कर चुका है और इस साल इनका लक्ष्य ऐसे 35-40 गांवों को रोशन करना है।
– पारस ने बताया कि 2013 में ही जब वह अपना पहला एक्सपीडिशन लेकर गए तो उनका मकसद लद्दाख के बच्चों के लिए शिक्षा का एक आधार स्थापित करना था। इसी दौरान इन्हें एहसास हुआ कि शिक्षा ही नहीं, इन क्षेत्रों में तो बिजली भी नहीं है। 2014 में 14 हजार ऊंचाई स्थित गांव सुम्दा चेन्मो में डीसी सोलर माइक्रो -ग्रिड्स स्थापित किए।2014-2015 में की एक रिसर्च में पाया कि लद्दाख और जंस्कार वैली के ऐसे 60 गांव और हैं। इसके बाद इन्होंने अलग-अलग कंपनियों से फंडिग की बात की और फिर 2015 में 10 गांवों को रोशन किया।
– इस साल इनका टारगेट ऐसे करीब 40 और गांवों को रोशन करना है। यह वो गांव हैं जिन्हें सरकार ने आजादी के इतने वर्ष बाद तक भी नजरअंदाज कर रखा था और अगले पांच साल तक भी सरकार की इस दिशा में न ही कोई काम करने की योजना थी।

1.5 लाख रुपए का एक माइक्रो – ग्रिड

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एक माइक्रो-ग्रिड में 30 एलईडी लाइट्स लगती हैं। इस तरह कुल मिलाकर यहां 240 एलईडी लाइट्स लगाई गई हैं। वहीं दो एलईडी टीवी लगाए गए हैं। पारस के मुताबिक, एक माइक्रो-ग्रिड पर करीब डेढ़ लाख रुपए का खर्च आता है।
जब मॉनेस्ट्री रोशनी से जगमगा उठी तो पहले दिन लोग लाइट जगाकर सोए।
जीएचई की स्थापना 6 अगस्त 2013 को चंडीगढ़ के पारस लूंबा ने की। पारस ने इसके लिए अपनी नौकरी छोड़ दी।
यहां तक पहुंचने के लिए खराब मौसम और रास्ते के बीच से गुजरते हुए 4-8 दिन तक का ट्रेक करना पड़ता है।
यहां सोलर लाइट लगाने का काम काम कोई सरकार नहीं बल्कि ग्लोबल हिमालयन एक्सपीडिशन (जीएचई) कर रहा है।
जीएचई पिछले ढाई साल में लद्दाख क्षेत्र में आने वाले 11 गांवों को सोलर ऊर्जा के माध्यम से रोशन कर चुका है।

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