October 24, 2017 9:36 am

राजा की सनक….न खेलूंगा….न खेलने दूंगा

शिमला,विमल शर्मा।
हिमाचल सरकार के मुखिया वीरभद्र सिंह ने जब से विधान सभा चुनाव से किनारा करने की बात कहीं है तब से कांग्रेसी नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस आलाकमान से भी किसी तरह की व्यापक प्रतिक्रिया नहीं दी जा रहीं हैं। हां इतना जरुर है कि वीरभद्र सिंह के करीबी नेता भी कह रहे हैं Virbhadra-Singhकि वह भी साहब की तरह विधानसभा चुनाव से किनारा कर लेगें। जिसके चलते इन दिनों हिमाचल में कांग्रेस सरकार व संगठन के नेताओं में अजीब सी खामोशी छाई हुई हैं। जो किसी बड़े राजनीतिक तूफान की तरफ इशारा कर रही हैं। ऐसे समय में वीरभद्र सिंह का इस तरह की बड़ी बात कहना जो इस बात की तरफ साफ इशारा करता है कि कांग्रेस से सभी वफादार सैनिक किसी बड़े फैसले के लिए तैयार रहे। वीरभद्र सिंह की इस तरह की कोड भाषा में संदेश देना भी कोई नई बात नहीं हैं क्योकि सभी जानते है कि वीरभद्र सिंह प्रदेश में किसी भी विधानसभा सीट पर किसी भी कांग्रेसी उम्मीदवार को पटकनी दे सकते हैं। अगर वीरभद्र सिंह को हाईकमान फ्री-हैड देने में आनाकानी करता है तो यह भी तय है कि कांग्रेस के कई दिग्गज धराशायी हो सकते हैं और नए लोगों को मौका मिल सकता हैं। राजनीतिक जानकार बताते है कि हिमाचल प्रदेश में इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में पहली जंग तो वीरभद्र कांग्रेस व 10 जनपथ कांग्रेस में होनी तय मानी जा रही हैं। इस बगावती राजनीतिक जंग को अंजाम तक पहुचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर में कांग्रेस के पूर्व कदावर नेताओं की भी अहम भूमिका रहने वाली हैं। यह भी माना जा रहा है कि हिमाचल में कांग्रेस पार्टी का विघटन कर पार्टी को हाईजैक होने के आसार पैदा हो सकते है। प्रदेश में इस तरह का राजनीतिक विस्फोट विधानसभा की सिंतवर में लगने वाली आचार सहिंता के साथ-साथ हो सकता है। अब यह देखना है की कांग्रेस आलाकमान वीरभद्र सिंह के सामने नतमस्तक होती है या फिर वीरभद्र कांग्रेस प्रदेश में अपनी सरकार बनाने की रणनीति तय करती है। प्रदेश कांग्रेस की यह लड़ाई इस समय बड़े ही दिलचस्प मोड पर पहुंच गई है।
हिमाचल कांग्रेस पार्टी के अस्तिव को लेकर आलाकमान व वीरभद्र कांग्रेस में आर-पार की जंग का एलान हो गया हैं। हिमाचल के सिंह ने नई दिल्ली 10 जनपथ में बैठी कांग्रेस पार्टी को हुंकार भर दी है। कांग्रेस में मचे इस धमासान का फायदा पार्टी को हो न हो लेकिन विपक्ष में आक्रामक तेवर अपनाए भाजपा को बैठे विठाए मुद्दा जरुर मिल जाएगा। पिछले एक अरसे में कांगे्रस पार्टी और सरकार के बीच खीचतान चली हुई हैं। यह खीचतान कोई छोटे स्तर पर नही हो रही बल्कि कांग्रेस पार्टी के अस्तिव को लेकर ही लड़ी जा रही हैं। जहां एक तरफ कांग्रेस आलाकमान पार्टी में युवाओं को आगे लाने की बात कह रही है और वयोवृद् नेताओं को पार्टी की मजबूती के लिए संगठन में काम करने को तबज्जों दी जा रही है। ऐसे में वीरभद्र की सनक क्या गुल खिलाएगी यह तो जल्द ही पता चल जाएगा। वहराल जो भी हो हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस संगठन के मजवूत न होने के चलते वीरभद्र सिंह को दरकिनार नहीं किया जा सकता हैं। कांग्रेस आलाकमान यह अच्छी तरह जानती है बावजूद इसके कांगे्रस का एक धड़ा प्रदेश में वीरभद्र सिंह के बिना विधानसभा चुनाव का ट्रायल करने की रणनीति में लगा हुआ हैं। पूर्व में प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर दौड़ाई जाए तो वीरभद्र सिंह के अलावा कांग्रेस में ऐसा कोई कदवार नेता नही उभर सका जिसने पार्टी और सरकार को अकेले अपने दम पर चलाने का मादा रखता हो। वीरभद्र सिंह ने अपने राजनीतिक कार्यकाल में कांग्रेस आलाकमान को शायद ही कभी ऐसा एहसास दिलाया हो की प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का जनाधार कम हुआ हो। कांग्रेस आलाकमान को हिमाचल में वीरभद्र सिंह की भूमिका को लेकर कोई संदेह नही है। हाईकमान जिस रणनीति के तहत हिमाचल कांग्रेस में भविष्य को लेकर रणनीति तैयार कर रहा है उसका आकलन किया जाए तो स्थिति साफ नजर आती है की मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के होते प्रदेश कांग्रेस पार्टी में बैठे दूसरी पंक्ति के नेताओं को पूरे प्रदेश स्तर पर जनता में स्वीकार्य स्थिति में लाया जाए। जो भी हो वीरभद्र सिंह आलाकमान की इस मंशा से भलिभांति परिचित है। जिसके चलते वीरभद्र सिंह इस वार विधान सभा चुनाव में कमजोर होने की स्थिति में नहीं रहना चाहते है। इसके लिए उनको किसी भी तरह से साम, दाम, दंड व भेद की नीति अपनानी पड़े। इसकी एक और खास वजह यह भी है की वीरभद्र सिंह के पुत्र विक्रमादित्य सिंह का राजनीति में टिकाकरण होना है। वीरभद्र अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटे को सौप कर अपना दायत्वि भी निभाने चाहते है। यही नही वीरभद्र सिंह के अलावा कांग्रेस के बुजुर्ग पूर्व मंत्री भी अपने-अपने पुत्रों को टिकट दिलाना चाहते है। ताकि इनकी राजनीतिक विरासत चलती रहें। इन सब का सपना वीरभद्र सिंह के होते ही पूरा हो सकता हैं। जिसके चलते वीरभद्र सिंह के साथ ज्यादातर नेता आखिरी दम तक साथ लड़ाई लड़ेगें। वहीं दूसरी तरफ कुर्सी की वाट जोत रहा कांग्रेस आलाकमान समर्थित प्रदेश कांग्रेसी नेताओं का एक धड़े के तेजतरार नेता को मुख्यमंत्री पद पर बिठाना चाहता है, जिसको लेकर अब द्वंद्व चला हुआ हैं। उधर, प्रदेश भाजपा में बैठे कई आला नेता है जो इस बात का सर्मथन करते है की राजा के बगैर प्रदेश में कांग्रेस की नैया पार नहीं लग सकती है।

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