June 29, 2017 7:34 pm

शायरों की महफिल

तुम्हारा ख़्वाब

किताबें झाँकती है बंद अलमारी के शीशों से.. जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी… अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के परदे पर .. दम तोड़ जाती है हर शिकायत लबों पे आकर...
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वो

वो शख्स, जिसने कहा था कि “बातें होती रहनी चाहिए” आज तक मेरे एक भी ख़त का जवाब नहीं भेजा उसने।। उसे लगता हे उसकी चालाकियाँ ………मुझे समझ नही आत...
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